लेटा है वो अर्थी पर,
अलविदा कहने कोई आया है।
पैरों की रुनझुन से वो
उसका पता लगाया है।
खनकी जब काँच की चूड़ी,
लगा तरक्की पर कुछ भेंट संग
वो लाया है।
भार पड़ा है छाती पर,
वो फूल चढ़ाने झुका है।
इतना भार फूल में कहाँ,
उसके माँग से कोई कण
शायद छलक आया है।
थमी रही वो पल भर को,
जैसे कुछ कहना चाहती हो।
हाथ काँपे, होंठ सिले रहे,
नज़रें ज़मीन से न उठ पाती हो।
लोगों ने कहा—“अब चलना होगा”,
वो आख़िरी बार मुड़ी है।
भीड़ में खो गई उसकी आहट,
पर रुनझुन जलते वक्त तक उसने सुनी है।
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