किस शून्य-कमल की नाभि में, प्रथम प्रणव का स्पन्दन था?
किस मौन-अनन्त की वीणा पर, सृष्टि-राग का वन्दन था?
ब्रह्मा बन नव प्रभात जगे जब, चेतन-कुसुम प्रस्फुटित हुए।
विष्णु बन समता की सरिता में, जीवन-स्वर संतुलित हुए॥
शिव के ध्यान-अग्नि-कुण्डों में, काल स्वयं निष्पन्द हुआ।
अहंकारों का हिम गलकर, चिदाकाश प्रकट हुआ॥
एक ही दीपक की तीनों, ज्योति-शिखाएँ भिन्न कहाँ?
सृजन, पालन, लय के भीतर, ब्रह्म-तत्त्व है अन्य कहाँ?
कमल न केवल पुष्प यहाँ है, अन्तःचेतन का उद्गम है।
शेष न केवल नाग यहाँ है, अनन्त सत्य का संगम है॥
डमरू का अनहद निनाद बना, वेदों का प्रथम उद्गीत।
शंख-स्वर में स्पन्दित होता, ब्रह्मचेतना का संगीत॥
हंस-विवेक उड़ा मन-आकाश, छूटे भव के पाश।
गरुड़-दृष्टि से ब्रह्म प्रकाशित, जाग उठा चिदाकाश॥
नन्दी-सा अचल समर्पण जब, अन्तर-द्वार प्रतिष्ठित था।
त्रिदेवों का दिव्य त्रयी-राग, प्राण-प्रकोष्ठों में स्थित था॥
त्रिदेव कहीं बाहर कब हैं? अन्तर ही उनका विस्तार।
सृजन, पालन, लय की धारा, बहता जिसमें ब्रह्म अपार॥
जिसने इन तीनों को जाना, वही स्वयं वेदान्त हुआ।
बिन्दु-बिन्दु में ब्रह्म प्रकाशित, जीव ब्रह्मैक्य-सिद्ध हुआ॥
- सनातन मुकुंद
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