नभ की नीली चादर से उतरा, पावन-पुंज झलकता है,
धरा-मौन के निस्तब्ध अधर पर, छंदों का रस झरता है।
रिमझिम की लय-वीणा पर, अंबर का स्वर सोता है,
अश्रु-बिंदु सा गिरकर भू पर, मन का विषाद धोता है।
सिंधु-हृदय की व्याकुलता, नभ की करुणा बन आती,
सघन तिमिर के आँचल से, स्वर्ण-धूल सी बरसाती।
पर्ण-पल्लवों के अंतस्तल में, गूढ़ राग बजता है,
शून्य क्षितिज की मूक वेदना, जल-कणों में सजता है।
तत्त्व-बोध सा शीतल-स्निग्ध, यह अमृत-धारा प्रखर है,
रिमझिम की प्रत्येक बूंद में, अव्यक्त ब्रह्म का स्वर है।
- सनातन मुकुंद
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