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पुत्री : भविष्य की ज्योति

                
                                                         
                            पुत्री उषा-किरण बन उतरे, तम का तिमिर मिटाती है,
                                                                 
                            
सूने मन के मौन कुंज में, नव-मधुरिम बरसाती है।

माँ की ममता बनकर बहती, पिता-हृदय की आशा है,
कुल-संस्कार की दीपशिखा वह, जीवन की अभिलाषा है।

उसकी हँसी में स्वप्निल नभ है, नयनों में आकाश रहे,
उसके कोमल पग से जीवन में, नवयुग का विश्वास रहे।

वह आँगन की सीमा नहीं है, सृजन-शक्ति की धारा है,
उसकी निर्भय चेतन-उड़ान, युग का नव उजियारा है।

जिस आँगन में पुत्री हँसती, मंगल-गीत सुनाई दे,
जिस घर में उसका मान सुरक्षित, देवत्व वहीं दिखाई दे।

ज्ञान मिले, अधिकार मिले और, साहस का संचार रहे,
अपने श्रम से अपना जीवन, गढ़ने का अधिकार रहे।

उसकी उज्ज्वल चेतन-ज्योति, नव-आलोक जगाती है,
पुत्री की निर्भय उड़ान से, मानवता मुस्काती है।
- सनातन मुकुंद
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8 घंटे पहले

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