नन्हे अधरों की मुस्कानें, जब आँगन में खिल जाती हैं,
माँ की सूनी पलकों में तब, सौ-सौ ऋतुएँ आ जाती हैं।
उँगली थामे चलना सीखे, जब शिशु डगमग पग धरता है,
हर ठोकर से पहले, माँ का ममता-आँचल बढ़ता है।
लोरी बनकर रात स्वयं, जब पलकों पर झुक जाती है,
ममता की मधु-सरिता घर-घर, अमृत-धारा बहाती है।
पिता के श्रम से सींचा जाता, सपनों का हर उपवन है,
उनके त्यागों से ही उज्ज्वल, होता जीवन का सावन है।
गुरु का स्नेह शिष्य-हृदय में, ज्ञान-दीप जलाता है,
अज्ञानों के तम को हरकर, नव-पथ उसे दिखलाता है।
प्रेम जहाँ वात्सल्य बनकर, जीवन में मुस्काता है,
वहीं मनुज के अंतर्मन में, ईश्वर स्वयं समाता है।
प्रेम न केवल शब्द, सृष्टि का सबसे पावन सम्बल है,
वात्सल्य-रस का यह अनुपम, अमृतमय मंगल-जल है।
- सनातन मुकुंद
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