मेघ-मृदंग मृदुल निनदित, नव-नभ राग सुनाता है,
स्नेह-सिक्त उस यान-यात्रा पर, सावन स्वयं लजाता है।
पीठ-लगी प्रिय, मौन अधर पर, स्वप्न-सुधा मुस्काती है,
स्पर्श-अलक्षित अंतर-वीणा, प्रणय-प्रभाती गाती है।
रक्तिम कुसुमित विटप-वितान, प्रेम-पथिक का साथी है,
वर्षा-मुक्ता का प्रत्येक कण, उर-दीपक की बाती है।
जल-कण-जर्जर जीवन-पथ भी, संग-सुधा से हँसते हैं,
शूल-विपिन भी चरण-स्पर्श से, नंदनवन-से खिलते हैं।
तुम संग हो तो पावस-पल भी, नित्य चिरंतन वसंत बने,
प्राण-प्रणय का यह अभिसार, युग-युग अमर अनंत बने।
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X