हिम-अंचल से झरती आई,
मौन प्रार्थना-सी मुस्काई।
शैल-शिखर के चरण पखारे,
पाषाणों से राग उचारे।
कंकड़ उसके खेल-सहचर,
लहरें जैसे चंचल अक्षर।
वन ने उसके गीत सँवारे,
पवन ने मधुर मंत्र पुकारे।
भँवर बने चिंतन के घेरे,
तट रहे प्रश्नों के डेरे।
बहती रही समय के संग,
छेड़ती अनहद का प्रसंग।
सागर के उर में समाई,
बूँद ने अपनी देह गँवाई।
तब जाना इस प्रवाह ने—
खोकर ही पाया जाता है।
- सनातन मुकुंद
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