हिमगिरि-मुकुट सुशोभित भाल, सागर चरण पखारे,
गंगा-यमुना पुण्य-तरंगें, नित मंगल-दीप सँवारे।
ऋषि-तप, वेदों की वाणी, कण-कण अमृतधारा,
विश्व-वेदिका पर दमक रहा, भारत देश हमारा।
माटी में वीर-बलिदानों की, रक्तिम गाथा गाती,
कण-कण में संस्कृति-ज्योति, युग-युग राह दिखाती।
भगत-सुभाष-आज़ाद अमर, त्याग बने उजियारा,
उनके बलिदानों से ही तो, लहराया ध्वज हमारा।
धर्म, भाषा, वेश अनेक, पर हृदय एक हमारा,
रंग अनेक, सूत्र अखंड, भारत-माँ का आँचल प्यारा।
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में, प्रेम-दीप झिलमिलाता,
सत्य-अहिंसा-त्याग-करुणा, विश्व-पथ दिखलाता।
अंतरिक्ष से सागर-तल तक, विजय-पताका फहरे,
ज्ञान-विज्ञान की ज्योति प्रखर, नव-क्षितिज पर ठहरे।
शांति-सुधा का दीप जलाकर, विश्व-गगन दमकाए,
जन-जन के कंठों से नित—भारत-माता जय गाए।
साँसों में तू, धड़कन में तू, तू ही प्राण हमारा,
तेरी माटी चंदन-सी पावन, जीवन से भी प्यारा।
तन-मन-धन तुझ पर अर्पित, जन्म-जन्म का नाता,
जय जय भारत! विश्व-वंदित—सनातन गौरव-गाथा।
- श्री सनातन मुकुंद
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