मौन-मुखी संकल्पों का, यह धवल हिमालय है,
अंतर्निहित तेज-पुंज का, यह अदम्य आलय है।
मर्यादा की प्रखर प्रभा का, यह पावन सम्मान है,
स्वत्व-बोध की प्रदीप्त ज्वाला, संस्कृति का अभिमान है।
नत नहीं जो विषम पथों पर, ध्येय-निष्ठ गतिमान है,
सत्य-सिंधु की उर्मिल लहर का, यह आत्म-सम्मान है।
अभेद्य, अडिग, अविचल चेतन का, यह दिव्य विस्तार है,
मनस्विता ही श्रेष्ठ मानव का, परम ज्योति-श्रृंगार है।
- सनातन मुकुंद
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