सावन की मधुर फुहारों में, कजरी मधुरिम गूँज उठी।
कोयल की कोमल तानों से, मन-वीणा फिर झूम उठी॥
पायल की मृदुल झंकारों से, हर मन सुर में ढल जाता।
पुरवैया के मधु-स्पर्शों से, रोम-रोम पुलकाता जाता॥
आम्र-डाल के झूलों पर, नव अनुराग पल्लवित हुआ।
रिमझिम की मृदु तालों से, अंतर-मन स्पंदित हुआ॥
सावन के सुर-संगम में, जीवन-राग झंकृत हुआ।
बिरहा भी मधुरिम बनकर, मिलन-राग मुखरित हुआ॥
कजरी लोक-हृदय की धड़कन, प्रेम-सुधा बरसाती है।
भारत की अमर लोक-धारा, युग-युग तक मुस्काती है॥
- सनातन मुकुंद
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