आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नत-मस्तक मानव-हृदय, अर्पित तन-मन-प्राण।

                
                                                         
                            गुरु ज्ञान-ज्योति शाश्वत, जीवन-पथ आलोक।
                                                                 
                            
जिनसे जगमग हो उठे, मन-बुद्धि और लोक॥

चरण-रज पावन सुधा, हर ले सकल अज्ञान।
वंदित गुरुवर की कृपा, जीवन का कल्याण॥

सत्य-सुधा से सींचते, श्रद्धा-तरु अविराम।
करुणा-कुसुम सुवासित, पुलकित हर धाम॥

वेद-विभा के दीप बनकर, खोलें ज्ञान-कपाट।
मोह-तिमिर सब क्षीण हो, प्रकटे सत्य-विराट॥

विवेक-वट की छाँह में, शीतल हो मन-प्राण।
सदाचार-सुरसरि बहे, सुरभित हो संसार॥

संयम, सेवा, साधना, जीवन के आधार।
गुरु-कृपा से सिद्ध हो, मानव का संस्कार॥

नत-मस्तक मानव-हृदय, अर्पित तन-मन-प्राण।
गुरु-चरणारविन्द में, पाए जग-जन परम-धाम॥

शत-शत वंदन गुरुवर, ज्ञानस्वरूप महान।
जय-जय सद्गुरुदेव की, गूँजे दिव्य-गुणगान॥
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर