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भारतमातृप्रार्थना

                
                                                         
                            प्रसीद भारतमातः स्वजनान् परिपालय।
                                                                 
                            
बुद्धिं विद्यां च नो देहि भवबन्धविनाशिनि॥ १॥

अज्ञानतः पाहि नः त्वं ज्ञानदीपं प्रदीपय।
धर्मे निष्ठां दृढां देहि वीर्यं तेजश्च वर्धय॥ २॥

शान्तिर्भवतु लोकेषु सर्वे सन्तु निरामयाः।
त्वयि भक्तिर्दृढाऽस्माकं नित्यं तिष्ठत्वचञ्चला॥ ३॥

आपद्भ्यः पाहि नो मातः राष्ट्रं पाहि निरन्तरम्।
वयं ते तनया माताः शरणं ते गताः सदा॥ ४॥

— श्री सनातन मुकुंद
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2 महीने पहले

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