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भारत-बोध : दार्शनिक राष्ट्रगीतिका

                
                                                         
                            भारत केवल भू-रेखा नहीं, चेतन ज्योति अपार,
                                                                 
                            
हिमगिरि उसका मौन तपोवन, सिंधु अनंत विचार।
गंगा उसकी स्मृति-धारा, युग का सत्य बहाती,
माटी उसकी मंत्राक्षर बन, जीवन-वेद सुनाती।

सूर्य-शिखर-सा ज्ञान जगे, मिटे तम-आवरण सारा,
‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा में, जागे भारत-बोध हमारा।
ऋत, सत्य, करुणा के दीपों से, अंतस हो आलोकित,
वसुधा को परिवार मानकर, भारत हो जग-दीक्षित।

कालचक्र के केंद्र-बिंदु पर, अक्षय दीप हमारा,
‘मैं’ में जब ‘हम’ खिले—तब भारत सबसे प्यारा।

- श्री सनातन मुकुंद
हंसवर, अंबेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
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2 महीने पहले

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