बीज में सोया वृक्ष था, संभावना का स्वप्न,
माटी की ऊष्मा पाकर, जागा जीवन-स्पंदन।
अंकुर फूटा—नभ की ओर, मूल धरा में धँसा,
एक ऊर्ध्वगामी हुआ, एक गहराई में बसा।
मूल बना आधार दृढ़, तना बना संबल,
ऊर्ध्वगति के साथ, गहराता गया बल।
शाखाएँ जब फैल चलीं, खुला दिशाओं का द्वार,
एक मूल से जुड़कर भी, बढ़ता गया विस्तार।
पत्तों ने रवि-रश्मि पी, रचा जीवन-रस अपार,
जो पाया बाँट दिया—यही वृक्ष का संस्कार।
कली बनी तो मौन में, संचित हुआ प्रसार,
पुष्प खिला तो सुगंध ने, लाँघा निज आकार।
फल लगा तो साधना, पहुँची अपने पार,
अंतस में संचित जो, बन गया जग-उपहार।
फल के भीतर बीज फिर, चक्र हुआ साकार—
‘मैं’ से ‘हम’, ‘हम’ से जग—यही जीवन-विस्तार।
- सनातन मुकुंद
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