हां, तेजपत्ता हूँ मैं!
सब्ज़ी में सबसे पहले डाला जाता हूँ।
स्वाद में अपनी सुगंध मिलाता हूँ।
आँच सहता हूँ, अपना अस्तित्व गलाता हूँ।
हर कड़वेपन में भी स्वाद भर जाता हूँ मैं।।
पर हाय! कैसी दुनिया की यह रीत!
मेहनत किसी की, और किसी के नाम जीत!
जब थाली में सजकर पकवान आता है।
तेजपत्ता सबसे पहले बाहर निकाला जाता है!!
क्या मेरी नियति बस इतनी ही है?
काम आना, फिर बेकार कहलाना!
राह बनाना उंचे मंज़िल के लिए,
खुद ही रास्ते से हटा दिया जाना!!
मन कहता है—बस, अब बहुत हुआ,
क्यों स्वार्थ की चौखट पर नतमस्तक रहूँ?
जिस महफ़िल में मेरी जगह ही नहीं,
वहाँ अपनी उपस्थिति का बोझ क्यों सहूँ??
फिर अन्तर्मन से एक आवाज़ आती है
क्या कर्म का मूल्य सम्मान से तय होगा?
क्या दीपक रोशनी देना छोड़ देगा,
यदि उसके हिस्से में अँधेरा ही होगा??
एक ओर आत्मसम्मान की उठती ज्वाला,
दूसरी ओर अधूरे संकल्पों का हवाला।
कभी लगता है, सब कुछ छोड़कर चल दूँ।
कभी लगता छोड़ो तम है, दीपक-सा जलूँ।।
बस बेकार की बातों में उलझना है तो उलझो,
पर मुझे अपनी सुविधा का सामान मत समझो।
मेरी चुप्पी को मेरी कमजोरी मत मानो,
मेरे कार्य को मेरी मजबूरी मत जानो।।
तेजपत्ता हूँ, कूड़ा नहीं-पहचान हूँ!
दिखाई भले न दूँ, पर स्वाद की जान हूँ।
दूध की मक्खी सा फेंक इतरा तो सकते हो,
पर मेरी सुगंध को कैसे मिटा सकते हो??
अब निर्णय की घड़ी है, मन दोराहे पर खड़ा,
एक ओर मोहभंग, दूसरी ओर संकल्प बड़ा।
हाथ खींच लूँ या मंज़िल तक जाता रहूँ।
अपने ही प्रश्नों से रात भर लड़ता रहूँ।।
और यदि तेजपत्ता ही बनना पड़ा,
तो बनूँगा—पर सिर झुकाकर नहीं,
अपनी सुगंध पर गर्व करके!
क्योंकि मेरा मूल्य इस बात से नहीं कि
थाली में रखा या निकाल फेंक दिया गया।
मेरा मूल्य इस बात से है कि,
मेरे होने से स्वाद कितना बदल गया!!
-शम्भु प्रसाद
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