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मेरा शहर कहीं खो गया

                
                                                         
                            मेरा बचपन जिस शहर में बीता था,
                                                                 
                            
आज वहाँ लौटकर आती हूँ तो लगता है—
शहर तो वही है,
बस मेरा शहर कहीं खो गया है।

जिन छोटे-छोटे पेड़ों को हमने
बचपन में पौधों की तरह देखा था,
आज वे आसमान छूते पेड़ बन गए हैं।
उनकी शाखाएँ इतनी फैल गई हैं
कि उनके बीच से पुरानी गलियाँ भी दिखाई नहीं देतीं।

कभी जिन रास्तों पर बिना सोचे दौड़ती थी,
आज उन्हीं रास्तों पर चलते हुए
हर मोड़ अजनबी लगता है।

वो घर नहीं रहे,
वो आँगन नहीं रहे,
वो आवाज़ें नहीं रहीं,
वो चेहरे नहीं रहे…
और सबसे ज्यादा दुख इस बात का है
कि अब उस शहर में
मेरा बचपन भी मुझे कहीं दिखाई नहीं देता।

पेड़ बड़े होते गए,
शहर बदलता गया,
लोग दूर होते गए…
और मैं भी जाने कब
उस पुराने शहर से बहुत दूर हो गई।

कभी लगता था,
बड़ी होकर लौटूँगी
तो अपना शहर मुझे पहचान लेगा।

पर आज लौटकर समझ आया—
शहर ने मुझे नहीं भुलाया,
बस समय ने उसे इतना बदल दिया
कि मेरी यादों वाला शहर
अब सिर्फ मेरी यादों में बचा है।

कुछ शहर नक्शे से नहीं मिटते,
वे हमारे भीतर से धीरे-धीरे मिटते हैं…
और शायद यही सबसे ज्यादा दर्द देता है
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7 घंटे पहले

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