पौधा अपनी जड़ें छोड़ना नहीं चाहता,
वो अपनी ज़मीन से उखड़ना नहीं चाहता।
मजबूरियाँ मजबूर कर देती हैं हर शख़्स को,
कोई भी अपने घर से बिछड़ना नहीं चाहता।
जिस आँगन में गुज़रा हो बचपन का हर लम्हा,
इंसान उस आँगन से बिछड़ना नहीं चाहता।
माँ की दुआएँ, बाप का साया जहाँ मिले,
कोई भी उस चौखट से निकलना नहीं चाहता।
रोटी की तलाश में निकल पड़ते हैं लोग,
वरना कोई अपनों से बिछड़ना नहीं चाहता।
जिस मिट्टी में खेलकर जवानी गुज़ार दी,
दिल उस मिट्टी को छोड़ना नहीं चाहता।
परदेस में कमाते हैं अपनों के वास्ते,
कोई अपना घर यूँ ही छोड़ना नहीं चाहता।
कुछ ख़्वाब हैं आँखों में, कुछ पेट की आग है,
इंसान यूँ ही अपना शहर छोड़ना नहीं चाहता।
हँसते हुए चेहरे के पीछे दर्द छिपा है,
कोई भी अपना दर्द दिखाना नहीं चाहता।
हर रोज़ नए शहर में उम्मीद ढूँढ़ते हैं,
कोई भी अपनों को भुलाना नहीं चाहता।
किरदार से मजबूर हैं, हालात से हारे,
कोई भी यूँ ख़ुद को बदलना नहीं चाहता।
पूछो कभी परदेस में रहने वालों से,
कौन है जो अपनों को याद करना नहीं चाहता?
‘प्यासा’ भी निकला है घर से कुछ बनने की ख़ातिर,
वो भी तो अपनी मिट्टी से बिछड़ना नहीं चाहता।
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