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मुद्आ बाक़ी रह गया

                
                                                         
                            दास्ताँ सारी कह गए  मुद्द'आ  बाक़ी रह गया,
                                                                 
                            
रंग सारे भर दिए रंग-ए-वफ़ा  बाक़ी रह गया।

तमाम ज़मीनी  दूरियाँ  मिटा  देने के बा'द भी,
दो  दिलों के  दरम्याँ  फ़ासला बाक़ी रह गया।

ज़िंदगी के  मस'अले आसानी से  सुलझ गए,
मगर  इज़हार-ए-इश्क़  करना बाक़ी रह गया।

अज़-सर-ए-नौ  ज़िक्र किए जाने के बा'द भी,
तफ़्सील से मुद्द'आ बयाँ होना बाक़ी रह गया।

ता-उम्र  उल्फ़त में  सरशार रहने के बा'द भी,
उस  के  दिल में  घर  करना  बाक़ी  रह गया।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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2 महीने पहले

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