दास्ताँ सारी कह गए मुद्द'आ बाक़ी रह गया,
रंग सारे भर दिए रंग-ए-वफ़ा बाक़ी रह गया।
तमाम ज़मीनी दूरियाँ मिटा देने के बा'द भी,
दो दिलों के दरम्याँ फ़ासला बाक़ी रह गया।
ज़िंदगी के मस'अले आसानी से सुलझ गए,
मगर इज़हार-ए-इश्क़ करना बाक़ी रह गया।
अज़-सर-ए-नौ ज़िक्र किए जाने के बा'द भी,
तफ़्सील से मुद्द'आ बयाँ होना बाक़ी रह गया।
ता-उम्र उल्फ़त में सरशार रहने के बा'द भी,
उस के दिल में घर करना बाक़ी रह गया।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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