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ख़्वाब की ताबीर

                
                                                         
                            ख़यालों की बिना पे ख्वाब की तामीर हो,
                                                                 
                            
ज़रूरी नहीं पूरी हर ख़्वाब की ताबीर हो।

ज़रूरी नहीं ख़यालों की हसीं  दुनिया  में,
हर बार चाँदनी महताब की दस्त-गीर हो।

सुब्ह-सवेरे आँख खुलते ही पेश-ए-नज़र,
मुक़म्मल  उस हसीं ख्वाब की तस्वीर हो।

रब ही जाने क्या हो अंजाम अरमानों का,
किस रंग में रंगी मोहब्बत की तक़दीर हो।

अपने ख़्वाब रात के हवाले करने के बाद,
देखना है क्या हमारे ख़्वाब की ताबीर हो।
- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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2 महीने पहले

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