आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सुना है पी गए थे हलाहल शंकर

                
                                                         
                            सुना है पी गए थे हलाहल शंकर
                                                                 
                            
फिर दुनिया में कहां से ज़हर आ गया
तुम तो कहते थे है इश्क़ बहुत इस ज़मीं से
फिर कहाँ से दरमियां में ये मुल्क ओ घर आ गया

करता है गुफ्तगू वो बस लबों से
दिल में तो उनके भी ज़हर आ गया
हम इंतज़ार में हैं अमन के सुबह से
उन्हें ख़ून बहाते तीसरा पहर आ गया


वो करते हैं अफसोस कि दुश्मन को इज्ज़त इस क़दर
क्या करें ख़ुदारा ज़ालिम मेरे घर आ गया
शर्म करो क्यों दिखाते हो हिन्द को आँखें
ताज्जुब है बाप पे गुस्सा इस क़दर आ गया

कर देते पाक तेरे वजूद से आलम
मेरे सामने इंसानियत का मंज़र आ गया
और यूं तो पढ़ाया है सबक़ हमने दुनिया को
इंसान हूँ मेरे सामने ख़ुदा का डर आ गया

क्यूँ तार तार करते हो दरमियाँ से रिश्तों को पहाट
बुजदिल ज़माने में क्या क़हर आ गया
-अश्क़ फ़तेहपुरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर