सुना है पी गए थे हलाहल शंकर
फिर दुनिया में कहां से ज़हर आ गया
तुम तो कहते थे है इश्क़ बहुत इस ज़मीं से
फिर कहाँ से दरमियां में ये मुल्क ओ घर आ गया
करता है गुफ्तगू वो बस लबों से
दिल में तो उनके भी ज़हर आ गया
हम इंतज़ार में हैं अमन के सुबह से
उन्हें ख़ून बहाते तीसरा पहर आ गया
वो करते हैं अफसोस कि दुश्मन को इज्ज़त इस क़दर
क्या करें ख़ुदारा ज़ालिम मेरे घर आ गया
शर्म करो क्यों दिखाते हो हिन्द को आँखें
ताज्जुब है बाप पे गुस्सा इस क़दर आ गया
कर देते पाक तेरे वजूद से आलम
मेरे सामने इंसानियत का मंज़र आ गया
और यूं तो पढ़ाया है सबक़ हमने दुनिया को
इंसान हूँ मेरे सामने ख़ुदा का डर आ गया
क्यूँ तार तार करते हो दरमियाँ से रिश्तों को पहाट
बुजदिल ज़माने में क्या क़हर आ गया
-अश्क़ फ़तेहपुरी
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