जिसे दवा समझ कर मैं सहलाती रही,
वो शख़्स मेरी जड़ों में ज़हर घोलता रहा।
ज़मीं पैरों से खिसकी तो होश आया मुझे,
कि मैं क्यूँ सारे गिले-शिकवे भुलाती रही।
मेरी तीमारदारी का ये सिला दिया तूने,
मैं वफ़ा बुनती रही,
तू साज़िशें बुनता रहा।
- शफ़क़ रऊफ
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