नवभारत का घोष दिगंत में,
उन्हें चाहिए नूतन वेष,
किंतु हमें प्रिय आदि-सनातन,
भारत का वह चिर-उन्मेष।
सतरंगी वसनो में सज्जित,
कंचन-आभरणों से दीप्त,
वही वधू-सी मातृभूमि हो,
अमित स्मृतियों से परिलिप्त।
मुक्ति-व्योम में उड़ते-उड़ते,
कटे मूल के बंधन आज,
छूट गया वह पुण्य-धरातल,
भूल गए हम अपना राज।
महापुरुष के भग्न स्वप्न की,
वीथी से हम गुज़र रहे,
शून्य गगन के अगम मार्ग पर,
तिमिर-बाण हम उतर रहे।
तोड़ प्रकृति के पावन नियम,
यह कैसा नूतन विलास?
जड़ विहीन आकाश-गमन यह,
है विकास या महा-विनाश?
-शफ़क़ रऊफ
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