दौलत का मिलना भी यहाँ आसां रहा मगर
दामन खुशी से अपना भरना महाल था
लोगों की इस भीड़ को पाना था सहल पर
एहसास-ए-दिल का कोई उभरना महाल था
रुतबा, मकाम, नाम तो मिल ही गया हमें
मगर खुल के मुस्कुराना, वो हँसना महाल था
काँटों पे चल के पार तो हम हो गए मगर
वफ़ा के उस मुसाफ़िर का खोना महाल था
अपनों के रूप में तो मिले सैकड़ों यहाँ
मगर कोई एक शख़्स अपना होना महाल था
-शफ़क़ रऊफ
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