विवेक की चिकनी बातें छोड़ो,
बात करो उस आदिम युग के आदि-छोर की।
क्या यही है तुम्हारी वह आध्यात्मिकता?
जो रीढ़ के भीतर सोए बोध को मथने नहीं देती,
जो वर्तमान की इस जर्जर, ढहती हुई देह को
इस दलदल और कीचड़ से उबरने नहीं देती।
और बदलने को क्या कहती है? वह अतीत—
जो उंगलियों के पोरों से ठंडी रेत की तरह फिसल चुका है।
अपने ही वंश को, अपनी ही संतति को
बिलखता, सिसकता हुआ पीछे छोड़ जाना,
और फिर कहना: सोचो उन पुरखों के बारे में,
उन सरपरस्तों की परछाइयों के बारे में,
जिनकी अस्थियां भी अब तक माटी की परतों मेंगलकर विलीन हो चुकी हैं, नामहीन हो चुकी हैं।
यह कैसी चेतना है तुम्हारी? या कोई गहरी मुमूर्षा है?
यह तो बस एक साज़िश है, एक भद्दा प्रयास है
खुरदरे, ठंडे अंधकार के कुएँ में ढकेलने की।
अब कोई यहाँ ज्ञान के ऊँचे पाखंड न बघाड़े,
कि अज्ञान के घने कुहरे में भटकता रहे यह मानस,
और हाथों में तीर-भाले थामे, उस क्रूर आदिम स्वामी का अट्टहास—
युगों-युगों तक उसी का होता रहे अभिनंदन, उसी की बजती रहे भेरी।
-शफ़क़ रऊफ
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