आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अजीब सा रिश्ता था उसका…

                
                                                         
                            अजीब सा रिश्ता था उसका…
                                                                 
                            
कभी मेरी ख़ामोशी भी पढ़ लेता था,

कभी मेरी बातों का मतलब भी नहीं समझता था।
कभी बिना कहे मेरा हाल पूछता,

कभी सामने होकर भी
मुझे अनजान-सा कर देता था।

कभी मेरी हँसी की वजह बनता,
कभी उसी हँसी के पीछे
छुपा दर्द दे जाता था।

उसकी मोहब्बत भी अजीब थी…
वो मुझे खोना नहीं चाहता था,
मगर मुझे अपना कहने से

हर बार डर जाता था।
मैंने भी उसकी इस उलझन को
मोहब्बत समझकर निभाया,

और वो हर बार
थोड़ा पास आकर
थोड़ा और दूर चला गया।

शायद उसे भी मोहब्बत थी…
बस मेरी तरह
उसे निभाने का हुनर नहीं था।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर