मैं अनजान हूँ,
मुझे नहीं पता
रात क्या होती है।
रात—
सुबह की ओर जाती
एक अँधीरी दिशा है।
रात,
तू कितनी निर्लज्ज है,
हर रोज़
सूर्यास्त के बाद
चुपचाप आ जाती है,
और बेशर्मों की तरह
सुबह होते ही
भाग जाती है।
तूने उजाड़ दिए हैं
कई घर—
जहाँ
एक अकेला कमाने वाला
सपनों के साथ
सोया करता था।
तू दयावान नहीं हो सकती,
क्योंकि तूने
कई बेगुनाहों की
हत्या की है।
तेरे डर से
सब लोग
चुपचाप बैठे हैं,
और तेरे ही डर से
सब
प्रकाश की तलाश करते हैं।
तू शैतान की तरह
सबको डराती है,
और सबसे ज़्यादा
उसे रुलाती है
जिसका प्यार
अधूरा रह गया हो—
जब वह
सोने जाता है।
— कुमार सौरभ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X