आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

करने को...

                
                                                         
                            जीवन में और भी हैं काम करने को,
                                                                 
                            
हम पैदा नहीं हुए सिर्फ़ नाम करने को।

ताल्लुक़ है आपसे तो फ़िक्र है आपकी,
वरना कौन बैठा है यूँ सलाम करने को।

हर शख़्स यहाँ अपनी कहानी में उलझा है,
किसके पास वक़्त है किसी को बदनाम करने को।

कुछ रिश्ते किसी गरज़ के मोहताज नहीं होते,
दिल ही काफ़ी है कोई रिश्ता तमाम करने को।

हमने तो मोहब्बत को इबादत ही समझा था,
तुमने ही रख दिया हमें इल्ज़ाम करने को।

मंज़िल भी मिलेगी, कभी पहचान भी होगी,
बस वक़्त तो दो ख़ुद को मुक़ाम करने को।

मक़सद तो हमारा भी बड़ा है इस जहाँ में,
हम आए नहीं हैं सिर्फ़ आराम करने को।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर