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तुम्हें जब देखकर

                
                                                         
                            तुम्हें जब देखकर पलकें झपकना भूल जाता हूँ।
                                                                 
                            
बिना लब खोले तासीर-ए-मोहब्बत आजमाता हूँ।

तुम्हारे आसमाँ में है मेरी मौजूदगी इतनी,
नज़र आऊँ न आऊँ, रात-दिन मैं टिमटिमाता हूँ।

घटाओं के बरसने पर पहाड़ों के कुहासों सा,
तुम्हारे पास आ कर प्यार की रंगत बढ़ाता हूँ।

तुम्हारी याद की खुशबू से जान-ओ-दिल मुअत्तर है,
कहीं बाहर नहीं, अपने ही अंदर तुम को पाता हूँ।

दिल-ओ-जाँ से यकीनन तुम मकां को घर बनाती हो,
मैं अपनी कोशिशों से जिन्दगी आसां बनाता हूँ।
- सतीश बोरकर
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2 सप्ताह पहले

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