दृश्य विहंगम है अद्भुत दरिया के साहिल पर।
अवहेलित है नज़ारे, नज़रें हैं मोबाइल पर।
हमने सोचा था सब की तकदीर सँवारेगा,
अपना उल्टा पड़ गया दाँव लगाना जाहिल पर।
नालायक नाकारे अक्सर मौज उड़ाते हैं,
आता है दुनियादारी का जिम्मा काबिल पर।
गुरबत की बस्ती में आकर मीठा बोलेंगे,
उल्लू सीधा करने से क्या होगा हासिल पर।
लोगों ने ही उसको ऐसा रूप दिया लेकिन,
मढ़ती है ये दुनियाँ सारा लांछन कातिल पर।
अक्सर खाई में धक्का अपने ही देते है,
ख्याल आया जब उसने पूछा जायें क्या हिल पर।
- सतीश बोरकर
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