आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दरिया के साहिल पर

                
                                                         
                            दृश्य विहंगम है अद्भुत दरिया के साहिल पर।
                                                                 
                            
अवहेलित है नज़ारे, नज़रें हैं मोबाइल पर।

हमने सोचा था सब की तकदीर सँवारेगा,
अपना उल्टा पड़ गया दाँव लगाना जाहिल पर।

नालायक नाकारे अक्सर मौज उड़ाते हैं,
आता है दुनियादारी का जिम्मा काबिल पर।

गुरबत की बस्ती में आकर मीठा बोलेंगे,
उल्लू सीधा करने से क्या होगा हासिल पर।

लोगों ने ही उसको ऐसा रूप दिया लेकिन,
मढ़ती है ये दुनियाँ सारा लांछन कातिल पर।

अक्सर खाई में धक्का अपने ही देते है,
ख्याल आया जब उसने पूछा जायें क्या हिल पर।

- सतीश बोरकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर