मन भी एक परीन्दा है
जो डाली डाली ठहरा है
तिनका तिनका चुन लाता है।
जहां तक अम्बर का पहरा है।
उड़ जाता है अनजाना सा,
घिर आता है दीवाना सा,
जाने किन सपनों के पीछे
झूमता है ये मस्ताना सा।
ख्वाबों से इसकी यारी है,
चाहत में बेशुमारी है,
चंचलता भ्रमण करती है।
पर पिंजरा इसकी लाचारी है।
जीत सका न मन को कोई,
मन ही जीता, हारा है।
मन का पंछी सागर चुनता
पानी जिसका गहरा है।
मन भी एक परीन्दा है,
जो डाली डाली ठहरा है।
तिनका चुन चुन लाता है
जहां तक अम्बर का पहरा है।
-संतराम शर्मा'हिन्दी'
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