घर आंगन की तुलसी बनकर
दर दरवाजे सजाती है,
बेटी घर की रोनक है,
जो हर पल राग सुनाती है।
पापा की वो प्यारी लाडो,
माँ के मन की परछाई है,
भाई के संकट की साथी,
देती रिश्तों को गहराई है।
वह हँस दे तो घर में जैसे
गुलशन सा खिल जाता है,
लेकिन उसकी खामोशी से
पूरा आंगन सहम सा जाता है।
परंपराओं के धागों को
वह प्यार सहित सुलझाती है,
बनकर उज्ज्वल किरण बेटियां
घर को रोशन कर जाती है।
-संतराम शर्मा'हिन्दी'
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