यह जीवन इक सिंधु सरीखा, जिसकी गहराई है अथाह,
लहरों की चंचलता ऊपर, भीतर शांत छिपा है राह।
तैर रहे जो सतह पर केवल, वो क्या जानें सार यहाँ,
तृष्णा की इस अंधी धुन में, भटक रहा संसार यहाँ।
जब तक अंतस के सागर में, गहरे तुम न जाओगे,
तब तक इस जीवन का असली, सत्य कहाँ तुम पाओगे?
महँगे हो गए भौतिक साधन, सस्ते हुए जज़्बात यहाँ,
बाहर-बाहर शोर बहुत है, भीतर छिपी है रात यहाँ।
ओ मानव! इस नश्वर जग में, तनिक ठहर चिंतन तो कर,
बाहर की इस अंधी दौड़ से, मुख मोड़ जरा भीतर मुड़।
कर ले तू अंतस में अवगाह, ज्ञान का मोती पाना है,
क्षणभंगुर इस काया को तो, एक दिन मिट्टी हो जाना है।
मज़हब और पाखंड की दीवारें, मन को केवल बाँध रही,
मर्यादा की पावन सरिता, भीतर-भीतर सिसक रही।
छोड़ो वाणी का यह तीखापन, लफ़्ज़ों में अब प्रीत भरो,
सत्य, शिव और सुंदर का, तुम मन ही मन अभिषेक करो।
जिसका आदि न अंत कहीं है, वो असीम सत्-चित्-आनंद है,
उसकी करुणा का रस भी तो, इस सृष्टि में अमंद है।
जब-जब डूबा मन संशय में, उसकी सत्ता ने संभाला,
अथाह प्रेम के सागर ने ही, हर मुश्किल में मार्ग निकाला।
करके अवगाह तू भक्ति में, खुद को उस पर वार दे,
कवि 'सुरेश' की यह वाणी, बस जीवन को नया आकार दे।
तभी सुखी यह मानस होगा, तभी मिटेगा अंधकार,
जब प्रेम और करुणा से महकेगा, यह सुंदर संसार।
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