शीर्षक - "शिव-साधना: अमरत्व की ओर"
दोहा १: "मस्तक के त्रिपुंड और तिलक को समर्पित
शीश मुकुट सा सोहता, चंदन का त्रिपुंड।
लाल तिलक माँ भवानी, नाशे संशय कुंड ॥
दोहा २: चेहरे के तेज और ओज को समर्पित
नयनों में गहरा प्रखर, सत्य-सनातन भान।
मुखमंडल पे चमकता, शिव-भक्ति का ज्ञान ॥
दोहा ३: रुद्राक्ष की अनेकों मालाओं को समर्पित
कंठ सजे रुद्राक्ष की, अनुपम अद्भुत माल।
मन का मनका जप रहा, आदि पुरुष महाकाल ।।
दोहा ४: हाथ जोड़े ध्यानमयी मुद्रा को समर्पित
कर जोड़े अंजलि बंधी, अंतर में वैराग।
श्वास-श्वास में रम रहे, अविनाशी शिव-राग ॥
दोहा ५: पार्श्व में विराजमान भगवान शिव को समर्पित
पीछे रक्षक रूप में, स्वयं खड़े नीलकंठ।
अभय हस्त वरदान दे, खोल रहे सब कंठ ॥
दोहा ६: नागदेव और दिव्य त्रिशूल को समर्पित
कंठ विराजे शेष नाग, हाथ लिए त्रिशूल।
दमन करे सब पाप का, शमन करे जग शूल ॥
दोहा ७: पावन शिवलिंग और कमल को समर्पित
दिव्य ज्योति का रूप है, पावन ये शिवलिंग।
अर्पित मन का कमल है, पाकर प्रभु का संग ॥
दोहा ८: शिखर पर लहराते ध्वज और मंदिर को समर्पित
शिखर भव्य केदार का, फहराए नित ध्वज।
शरण आपकी जो मिला, मिटे काल का वज्र ॥
दोहा ९: मोक्ष और भवसागर पार करने की कामना
हाथों में छाले पड़े, पग-पग बढ़ती आस।
भवसागर से तार दो, मैं हूँ आपका दास ॥
दोहा १०: कवि 'सुरेश' का समर्पण (उपसंहार)
कहे 'सुरेश' पुकार कर, शिव ही मूल-आधार।
'पटेल सुरेश' की लेखनी, वंदन करे बारंबार ॥
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