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नया जमाना

                
                                                         
                            अच्छी थी वो पगडंडी अपनी,
                                                                 
                            
सड़कों पर अब जाम बहुत है I
फुर्र हुई फुर्सत की चिड़िया,
सबके हिस्से काम बहुत है I

बूढ़े अब किस काम के ठहरे,
हर बच्चा विद्वान बहुत है I
उजड़ गए आंगन-बाग सभी,
दो गमलों में शान बहुत है I

मट्ठा-दही पुराने किस्से,
कहते हैं - ज़ुकाम बहुत है।
चाय की चुस्की मिल जाए तो,
लगता है आराम बहुत है I

चिट्ठी-पत्री खो गई कहाँ जाने,
मोबाइल पर पैगाम बहुत है I
झुके हुए हैं नन्हे कंधे,
बस्तों में सामान बहुत है I

रिश्तों की गर्माहट कम होती,
अहंकार और मान बहुत है I
चेहरे हंसते कम ही दिखते,
मन में हर इंसान बहुत है I

सुविधाओं के ढेर लगे हैं,
साधन बेशुमार बहुत है I
फिर भी देखो इस दुनिया में,
हर इंसान परेशान बहुत है I

 
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2 महीने पहले

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