इंसानियत मर गई इंसान की,
दिलों में, अब प्रेम कहाँ बाकी रहा।
जैसे मझधार में डूबती हो कोई कश्ती,
उसे बचाने वाला कोई न रहा।
चारों ओर भीड़ तो बहुत है मगर,
दर्द बाँटने वाला कोई न रहा।
रिश्ते अब स्वार्थ की डोर से बंध गए,
अपनापन जैसे कहीं खो गया।
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