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बन ले नींव उपल रे बंदे

                
                                                         
                            बन ले नींव उपल रे बंदे
                                                                 
                            

मुखड़ा
बन ले नींव उपल रे बंदे,
अनजाना-अज्ञात,
मत खो तू पहचान स्वयं की,
लेकर मान विसात।
बन ले नींव उपल रे बंदे,
अनजाना-अज्ञात।

अंतरा 1
खुशी-खुशी सह ले सीने पर,
भारी-भरकम भार,
तेरे ऊपर खड़ी रहेगी,
इमारत भी हज़ार।
नाम तेरा कोई न जाने,
न हो तेरा बखान,
फिर भी अपने कर्म-राह पर,
देना हरदम ध्यान।

मुखड़ा
बन ले नींव उपल रे बंदे,
अनजाना-अज्ञात,
मत खो तू पहचान स्वयं की,
लेकर मान विसात।

अंतरा 2
पा ले आश्रय कष्ट-सहन में,
मत रख मन में मैल,
शीर्ष जड़े सभी पत्थरों से,
काहे करे झमेल?
सदा उड़ेली जाती उनपर,
लौकिक सारी शान,
नींव रहे गुमनाम सदा ही,
फिर भी मान महान।

अंतरा 3
जो सहता है भार जगत का,
वही भवन आधार,
त्याग-तपस्या जिसकी पूँजी,
वह सच्चा सरदार।
नाम मिटे तो मिट जाने दे,
कर्म न जाए व्यर्थ,
नींव बने जो औरों खातिर,
उस जीवन का अर्थ।

समापन
आदि-अनादि यही संदेशा,
कर्म रहे अविराम,
ऊँचाई पर जो दिखते हैं,
जड़ उन्हीं का धाम।
बन ले नींव उपल रे बंदे,
अनजाना-अज्ञात,
कहे 'निराला' मिटे नाम तो,
अमर कर्म साक्षात।
बन ले नींव उपल रे बंदे,
अनजाना-अज्ञात...।
संजय निराला
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1 month ago

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