जो धूप में बैठ कर ताली देते हैं
बात बात पर सूरज को गाली देते हैं
छीन लेते हैं उसके निवाले भी
परोसकर जिसको थाली देते हैं
रहते हैं जो दरख्तों के दरमियां
वही काट अक्सर डाली देते हैं
ख़्वाहिश पढ़ने की रखने वाले
ख़त का कागज़ खाली देते हैं
बख़्शिश किससे मांगे बहार
आग बगीचे में माली देते हैं
कैद कर जुगनुओं को उजालों में
तितलियों को रात काली देते हैं
जब पतझड़ हो घर आंगन में
सूखे पत्ते भी रखवाली देते हैं
चल सकते हो अपने साथ चलो
दुनियां वाले खाम ख़याली देते हैं
-संजय कुमार
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