आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रेम अगर सात फेरो में होता

                
                                                         
                            बँधा फेरों में गर होता, कभी ये प्रेम का नाता,
                                                                 
                            
तो कान्हा के अधर पर नाम, बस रुक्मिण का ही आता।

न राधा नाम पर यूँ साँवरे की आँख भर आती,
जुदा होकर भी कान्हा से, न राधा 'कृष्ण' कहलाती।
अगर बस साथ रहने का, ही दूजा नाम प्रीत होता,
तो यमुना के कछारों पर, न कोई इस तरह रोता।

हवाओं से न राधा यूँ, पता घनश्याम का लेती,
न अपनी ज़िंदगी रो-रो, वो विरहा नाम लिख देती।

न फेरे थे, न सिंदूर था, मगर आत्मा से नाता था,
बिना राधा कहे कोई, कहाँ माधव बुलाता था!
बँधा फेरों में गर होता, कभी ये प्रेम का नाता...

अगर पाने का ही बस नाम, ये संसार रखता तो,
महल की छाँव में मीरा, का मन भी चैन चखता तो।
न वो गलियों में फिरती यूँ, न पाँवों बाँधती घुँघरू,

न विष को मानती अमृत, बहाकर नेह के आँसू।
ज़माना पूछता था हक़, तो मीरा मुस्कुराती थी,

जहाँ सर्वस्व अर्पण हो, वहाँ क्या हक़ जताती थी!
न छू पाई कन्हैया को, मगर हर साँस धड़काया,

बिना स्पर्श के मीरा ने, प्रभु को रूह में पाया।
बँधा फेरों में गर होता, कभी ये प्रेम का नाता...
मुकम्मल जो हुआ जग में, वो बस संसार बन बैठा,
अधूरा रह गया जो दर्द, वो अवतार बन बैठा।
न राधा को मिला कान्हा, न मीरा की छुअन पाई,
मगर माधव की हर धड़कन, इन्हीं दो से निकल आई।
जहाँ मिलना मुक़द्दर हो, वो केवल रीत होती है,
जहाँ खोकर भी पा लेना, वही तो प्रीत होती है!
बँधा फेरों में गर होता, कभी ये प्रेम का नाता,
तो कान्हा के अधर पर नाम, बस रुक्मिण का ही आता...
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर