चमकता चाँद तेरा हो रहा है धुंधला जो
दुआ खुदा की उसमें नूर लेके लाती है
मीठी-मीठी बातें करके सबको लूटता जो
खात्मा बेदर्द उसको फिर मिटाती है
अंत सबका ही एक दिन मुकर्रर है
हकीकत ये समझ में क्यों नहीं आती है
मिटा न जिंदगी तू आने वाले पीढ़ी की
कायनात यह सबक तुझे सिखाती है
रहमत-ए-खुदा खुशी की बारिश हो
ज़िंदगी कुँवर ये मोल तभी पाती है
-कुँवर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X