आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोरोना काल

                
                                                         
                            जिन्होंने भारत की माटी को, इस महाविपदा में संभाला है,
                                                                 
                            
अपने सुख-चैन को भूलकर, हर बुझती सांस को पाला है।भुलाकर अपने बच्चों को, देश-सेवा में मन लगाया है,
ख़ुद भूखे प्यासे रहकर भी, औरों का जीवन बचाया है।
वो खाकी वर्दी के राही, जो तपती राहों पर डटे रहे,
अपनों की रक्षा की खातिर, बनकर चट्टान वो खड़े रहे।ताकि कोई बेबस राह न भटके, कोई मासूम न रो पाए,
उनके इस अर्पण पर, भला किसकी आँख न भर आए?
वो श्वेत वस्त्रधारी डॉक्टर, जो महीनों घर न जा पाए,
उस पीपीई किट की घुटन में, जिसने आँसू-पसीने बहाए।संकट के उस काले दौर में, जिसने हर बीमार को अपनाया,
मौत के साए के बीच रहकर, जीवन का दीप जलाया।
औरों की सांसें बुनते-बुनते, जो ख़ुद गहरी नींद सो गए,
देश को ज़िंदा रखने को, जो खुद मौत की नींद सो गए।
आम नागरिकों ने भी तब, इंसानियत का धर्म निभाया,
जिसके पास जो भी था संचित, उसने औरों पर लुटाया।किसी ने रोटी बांटी, किसी ने प्राणवायु का दान दिया,
भेदभाव सब भूलकर सबने, इस महा-दर्द को जिया।
समझते हैं इस देश को, अपने परिवार जैसा,
तभी तो मिलकर सबने झेला, वो तूफ़ान और मंज़र ऐसा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर