पसंद नहीं है बिल्कुल भी जो
देखने से उसको कोई गुरेज नहीं है
कुछ अच्छी बातें दिखें उसमें भी तो
उसे अपना लेने से कोइ परहेज नहीं है
पसंद न होने के कारण हैं कुछ और
नहीं देना चाहता मैं उन बातों पर जोर
पर उनसे उठता है कुछ ऐसा शोर
कि नाव घूम सकती नहीं उस ओर
हिम्मत उसकी भी गजब की वाह-वाह
डुबाकर सबकुछ चले शान से वह राह
दूसरों को रस्ता दिखाए इस तरह
जैसे हर कहीं धूप बस उसमें ही छाँह
होकर बेईमान वह सिखाता ईमान
हर कोइ ही उससे ताज्जुब हैरान
पर उसके होंठों पर रहती मुस्कान
कुदरत तूने रचा कैसे ऐसा इंसान
-कुँवर संदीप सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X