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खुद को निष्पक्ष कहे

                
                                                         
                            जीवन के जटिल पथ पर
                                                                 
                            
कैसा है आना-जाना
विवेक को हो विवश जहां
पड़े सीखा ज्ञान भुलाना
हर ओर यहाँ आंधी है
हर कोई अपना ही देखे
किसी और को जरा भी
समझे ना अपने लेखे

अपना हित ही दहला है
बाकी सबका हित नहला
कर कुछ-कुछ और कहे
मन सबका दे वो बहला
रुतबा उसे कुर्सी का है
बाकी सब ऋतु के मारे
कहता गलत उन्हीं को
जो करते सही बेचारे

पक्ष दुर्पक्ष का लेकर
खुद को निष्पक्ष कहे
जो सच पक्ष में हो
उनको ही विपक्ष कहे
लुका छुपी सही-गलत की
हर शय में है जहां के
कुँवर नहीं यह तुममें
तुम हो ही नहीं यहां के

रहना है अगर यहां पर
खुद में इसको डालो
रंग खुद को इस रंग में
इस जहां का बना लो
-कुँवर संदीप सिंह
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3 महीने पहले

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