काया के भूख की काया के प्यास की
दीवानगी हो जिसमें अपने ही रास की
हो वह भी इतनी की अपनों को छोड़ दे
गहरे नाते रिश्तों को बाहों में तोड़ दे
चमकें आँखें होठ पर मुस्कान तब भी हो
किसी को न नसीब ऐसी दुकान कभी हो
-कुँवर संदीप सिंह
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