आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हिन्दी दिवस: बस-बस-बस!

                
                                                         
                            हिन्दी दिवस: बस-बस-बस!
                                                                 
                            
बहुत हो चुका बस-बस, और नहीं अब हिन्दी दिवस
घर को ही घर वाला तरसे, मुस्काँ की जगह आँसू बरसे
घर वाला इसको सहे कैसे, जाने दे इसको बहे कैसे
अपने ही राष्ट्र के भाषा की, धुंधली होती परिभाषा की
है तो विरोधाभास बहुत, होता क्यों नहीं आभास बहुत
बाहरवाली इसे दबाती है, कैसी बन रही परिपाटी है
मानस दिवालियापन जिसको, मानते दीवानापन इसको
अपनों को छोड़ है सुख कैसा, गैरों संग सुख है भ्रम जैसा
भ्रम कहाँ साथ निभाता है, आगे गायब हो जाता है
भ्रम के साथ न और जियो, हिन्दी की रसना को पियो
हिन्दी का ही बोलबाला हो, अपने भाषा की माला हो
मोल अधिकतम अपनों को, पूरा करता है सपनों को
भाषा अपनी साँचा अपना, आशा अपनी तराशा अपना
नए और पुराने सब हिन्दी, चमके ज्यों मोती की बिंदी
हर ओर हो जाए व्याप्त यही, सबको लगे पर्याप्त यही
मिल जाने दो भाषा को यश, बरसे हिन्दी पूरे ही बरस
बहुत हो चुका बस-बस !, और नहीं अब हिन्दी दिवस
-संदीप सिंह कुँवर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर