हरियाली थी जो सघन कल तक
क्यों लगे आज वह सूखी सी
थी कल तक मुस्कान में डूबी
क्यों लगे आज वह रूखी सी
कैसे खो गया अचानक सब
कल तक था जो भी भरा हुआ
कल तक जिसमें थी बहुत हलचल
आज क्यों सुस्ती से भरा हुआ
चलता है दूर तक सही है जो
नहीं सही जल्दी गिर जाता है
जीवन कुदरत देती है उसे
जो सही राह पर जाता है
-कुँवर संदीप सिंह
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