आँख में चुभता रहा,
और कर दिया सोना दूभर
रात कल इक ख़्वाब ने ,
रक्खा जगाकर रात भर
कभी इस शहर,
कभी उस शहर
सच्चाई से कुछ बेख़बर
और रात के तीजे पहर
मुझे ले चला वो राह ऐसी
जाते नहीं हैं सब जिधर
पूछा जो मैंने ख़्वाब से
क्यूँ फिर रहे बेताब से
जलते हुए आफ़ताब से
बहते हुए सैलाब से
रुख़ ख़्वाब ने मेरा किया
जवाब कुछ गहरा दिया
तुमने सजाया है मुझे
ये जग पराया है मुझे
जग चिलमिलाती धूप है
तेरा ही साया है मुझे
तू चाहे मुझको तोड़ दे
यूँ बीच में ही छोड़ दे
और डर की चुनर ओढ़कर
सब भाग्य के संग जोड़ दे
मैं गुम भले हो जाऊँगा
मिटने न फिर भी पाऊँगा
रहूँगा जीवन-द्वंद्व में
अफ़सोस बनकर आऊँगा
हूँ ख़्वाब, मुझको राग दे
अब नींद को तू त्याग दे
ये शक की गठरी छोड़कर
निज हौसलों की आग दे
कहा पाश और फ़राज़ ने
कि ख़्वाब यूँ मरते नहीं
मारकर इनको कभी
है आदमी उबरते नहीं
बात गहरी थी बहुत
नींद मेरी उड़ गई
ख़्वाब ने ऐसा झकझोरा
एक राह मन में जुड़ गई
वादा किया फिर ख़्वाब से
मिटने न मैं दूँगा कभी
हो तुम ज़रूरी आँख को
हो पाँव को जैसे ज़मीं
ये ख़्वाब की जो डोर है
इसका न कोई छोर है
वर्षों से खींचे जा रही
जीवन-पतंग पुरज़ोर है
है ज़िंदगी इक ख़्वाब-सी
और ख़्वाब जैसी ज़िंदगी
ये ख़्वाब मिटने दूँ नहीं,
ये ख़्वाब मिटने दूँ नहीं,
ये ख़्वाब मिटने दूँ नहीं।
- संदीप मेहता ‘दीप’
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