मोहब्बत को निचोड़ा जा रहा है।।
दिलों को कबसे तोड़ा जा रहा है।।
सियासत नाम लेकर दोस्तों अब,,
फ़िज़ा में ज़हर घोला जा रहा है।।
कहानी जानते तो सब है लेकिन,,
किताबों को झिंझोड़ा जा रहा है।।
दफ़ाएं कितनी संग होती हैं देखो,,
मुर्दा लोगों को जोड़ा जा रहा है।।
बिका हर आदमी कागज़ के हाथों,,
फ़ैसला बे-हक़ में मोड़ा जा रहा है।।
मुझे कोई नाम लेकर मत पुकारो,,
कहे ना कोई के भगौड़ा जा रहा है।।
नज़र का खेल है क्या कहना देव,,
बुरे इक दौर से जोड़ा जा रहा है।।
-सुनील देव
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