रात के पर्दे तले इक शाम सोती रह गई।।
ज़िंदगी मेरी ये बस बदनाम होती रह गई।।
क्या किसी को पाएंगे आए और चले गए,,
दिल की सारी आरज़ू ज़ाम पीती रह गई।।
गमजदा ही क्यूँ रहूँ जब दिल ही नहीं रहा,,
बेवज़ह ही ज़िंदगी सलाम करती रह गई।।
कोई मुझको पुकारे तो अब क्या पाएगा,,
एक अरसा हुआ ग़ुमनाम मरती रह गई।।
कस्ती किनारे लगी अपनी फ़िर भी मगर,,
नदी फिर भी अपना काम करती रह गई।।
ना तो जाँ ही रही अपनी ना ज़िस्म ही रहा,,
वो थी के बस अपना काम करती रह गई।।
कहाँ से चला था के देव कहाँँ को जाऊँगा,,
धड़कनें बेवज़ह ही क़याम कहती रह गई ।।
-सुनील देव
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