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पूछते हो क्या।

                
                                                         
                            गली कूचे दर ओ दीवार मकाँ से पूछते हो क्या।।
                                                                 
                            
पता अपनी मोहब्बत का हवा से पूछते हो क्या।।

कभी जो पल गुज़ारे थे किसी के साथ मिलके वो,,
लगा इक मोड़ क़िस्मत का ख़ुदा से पूछते हो क्या।

नहीं मुमकिन नहीं कुछ भी सुना है कई बुजुर्गों से,
अभी कुछ वक़्त है बाक़ी सज़ा से पूछते हो क्या।

तुम्हें क्या लगता हैं दुनियाँ तुमको माफ़ कर देगी,,
इसे मालूम है सब कुछ छुपा के सोचते हो क्या।।

उसे जब याद आएगी वो आ जाएगी मिलने भी,,
अभी मशरूफ़ है खुद में खिजां से पूछते हो क्या।

यहाँ किसका क़त्ल किसने किया सब जानते तो है
क़सम देकर अदालत में गवाह से पूछते हो क्या।।

क्यूँ अपनी जवानी में किसी का एहसान लेते देव,,
अभी बहुत दम है निगाहों में सबा से पूछते हो क्या
-सुनील देव
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3 महीने पहले

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