उभरा है कोई दर्द जो याद ज़बानी है आ रहा।।
कुछ तो हुआ है आँख में जो पानी है आ रहा।।
आ चलके देखते हैं पास आखिर ये क्या हुआ,,
सर से नखूं तक हर जगह सुर्ख पानी आ रहा।।
क्या वफ़ा के बदले ज़ख्म ही मिलते हयात में,,
या वहम ही है जो ख़्वाब में ताबानी आ रहा।।
इक ख़्याल के सहारे भी क्या बीतेगी उम्र अब,,
या पड़ाव ज़िंदगी में कोई नया फ़ानी आ रहा।।
दस्तूर होता मानते भी के अच्छा हुआ जो हुआ,,
ये क्या हुआ है ज़हन में आज आयानी आ रहा।।
तबियत ख़राब है तो चलो आराम कर लो कुछ,,
मंज़िल तो मिल ही जाएगी अरमानी आ रहा।।
तुम भी ग़लत नहीं हो और हम भी सही है देव,,
अब दौर देखना है के कितना अर्ज़ानी आ रहा।।
-सुनील देव
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